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“विकासानंद मिशन” का संबोधन प्रथम एक व्यक्तित्व के प्रत्यय से निर्माण
हुआ। यही शब्द एक दर्शन प्रणाली का प्रबोधन देने लगा, फिर एक संस्था के रूप में यह शब्द उद्बाधित हुआ । प्रश्न यह उठता है कि विकासानंद मिशन का अभिप्राय क्या है? विकासानंद मिशन एक अखंड जीवन तत्व का वितरण केंद्र है, एक शुद्ध चैतन्य प्रवाह है। यह प्रवाह व्यक्ति रूप से विचार रूप में समाविष्ट और विकसित होता चला गया। मानवता के मूल्यों का संवर्धन, संरक्षण इस प्रवाह में प्रेषित है। इस प्रवाह के सूत्र को समझने के लिये उसका संवेग, उसकी दिशा, उसके अंतर्बाह्य रूप को जानने के लिये, मूल निमित्त व्यक्ति रूप का दर्शन लेना अपरिहार्य है।

यह प्रवाह “मनुष्य का विकास” अर्थात विकासानंद मिशन बढ़ता चला गया। अनुगामी एकत्रित हुये, वैचारिक प्रवाह से मुग्ध हुये, आनंद से युक्त चिंता से मुक्त एक अविभक्त कारवाँ प्रगट हुआ। इस प्रवाह का एक विहंगम दृश्य आकारित होने लगा। देखते-देखते व्यक्तियों के प्रवाह को एक संस्था का परिमाण प्राप्त हुआ। स्वामी विकासानंदजी ने अपने अपने मिशन के पूर्ति के उद्देश्यों के लिये निम्नलिखित शक्ति केंद्र स्थापित किये।

(1) विकास आश्रम, नागपुर (महाराष्ट्र) सन 1954 विकास आश्रम,
(2) गंगाधर आश्रम, खरदा, कोलकाता (प.बंगाल) सन 1965 गंगाधर आश्रम,
(3) श्रीराम मंदिर, हसदा, रायपुर, (म.प्र.) सन 1971 श्रीराम मंदिर,
(4) विठ्ठल मंदिर, सावंगी, वर्धा (महाराष्ट्र) सन 1971 विठ्ठल मंदिर,
(5) श्रीपाद आश्रम, ग्वारीघाट, जबलपुर (म.प्र.) सन 1975 श्रीपाद आश्रम,
(6) माता वज्रेश्वरी मंदिर, शहापुरा (म.प्र.) सन 1977 माता वज्रेश्वरी मंदिर,
(7) कमलासन (बगलामुखी), कमलासन (बगलामुखी),अकोला (महाराष्ट्र) सन 1979
(8) रुद्र हनुमान मंदिर, एमाबडोदिया, इंदोर, (म.प्र.) सन 19 रुद्र हनुमान मंदिर, 82

प.पू. स्वामी विकासानंदजी ने अपने जीवनकाल में ही उनके द्वारा स्थापित सभी
आश्रमों के संचालन की जिम्मेदारी ट्रस्ट बनाकर अपने भक्तों को सौंप दी। प.पू.स्वामी विकासानंदजी ने अपने कार्यक्षेत्र को सिर्फ व्यक्ति में मनुष्यत्व के विकास तक ही सीमित नहीं रखा, उन्होंने इंदौर के आश्रम में अरुंधती  वैद्यकीय केन्द्र  एवं नागपुर में वासंती प्राथमिक पाठशाला व विकास क्लीनिक की स्थापना की। समाज के निचले तबके को वैद्यकीय एवं शैक्षणिक सुविधा उपलब्ध कराना मुख्य उद्देश था, जो आज भी सुचारु रूप से कार्यरत है।

विकासानंद मिशन -एक प्रवाह गाथा

 सर्वविदित स्वामी विकासानंदजी का जन्म दिनांक 3 जुलाई 1915 को नागपुर के एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। पिता गुणवंतराव लांबे एवं उनकी माता जानकी के ज्येष्ठ पुत्र बळवंत लांबे का शैशव एक सामान्य बालक की तरह बीता। परिवार के साथ बद्रीनाथ धाम यात्रा के समय एक सिद्ध साधु पुरुष द्वारा उन्हें इस तरह संबोधित किया गया -“नियति ने तुमको जो कार्य सौंपा है उसे पूर्ण करने के लिये भविष्य में तुम्हें हमारे पास ही आना पड़ेगा।”समाज में वे बाबासाहेब के रूप में जाने जाते थे । जीवन के गूढ़ सत्य एवं प्रगल्भ आध्यात्मिक ज्ञान को प.पू.स्वामीजी बहुत सरल एवं जन सामान्य के लिये अनुकरणीय भाषा में इस तरह व्यक्त करते थे।

Path to Divinity

दैवी चमत्कार या असामान्यता कहीं नहीं थी । जीवन के 17-18 वर्ष के बाद बळवंत लांबे के व्यक्तित्व में कुछ बदलाव के संकेत मिलने लगे । लगने लगा कोई दैवी शक्ति उनके जीवन को नियंत्रित कर रही है। श्री. बळवंत लांबे आर्थिक स्थैर्यता के लिये एक बीमा कम्पनी में अधिकारी के रूप में कार्यरत हो गये । उनका विवाह कु.लीलाबाई से हुआ। सुस्वरूप पत्नी, आर्थिक स्थैर्य, समाज में प्रतिष्ठा, लौकिकदृष्ट्या जीवन पूर्णतः सुखमय था। ईश्वर प्रदत्त मधुर आवाज और संगीत में रुचि थी। अप्रैल 1941 में बाबासाहेब जीवन में बदलाव आना शुरू हुआ, चारों ओर सुख समुद्धि होते हुये भी वे सामान्य मनुष्य की तरह आसक्ति के साथ परिवार में रममाण नहीं हो पा रहे थे। एक अजीबसी बेचैनी व उदासीनता ने उन्हें घेर लिया था । what next? यह यक्ष प्रश्न सामने था। दिसंबर 1941 में अचानक बाबासाहेब गंभीर बीमार हो गये तेज बुखार था, डॉक्टरों से निदान नहीं हो रहा था । 15 दिनअवचेतन अवस्था में चले गये।

इस दौरान उनके मुख से अंग्रेजी व बंगाली में आध्यात्मिक उद्बोधन होते रहे व एक दिन वे अचानक स्वस्थ हो गये, उन्हें बीता कुछ याद नहीं था। इस घटना की पुनरावृत्ति भविष्य में कई बार हुई। परिवारजन परेशान थे, इस प्रकार के उपचार शुरू थे। बाबासाहेब ने बीमा कंपनी की नौकरी भी छोड़ दी थी। वे खुद भी परेशान थे, इसी परेशानी की हालत में वे अकेले घर छोड़ निकल पड़े। निराश भूखे प्यासे खंडवा पहुँच कर एक जगह बैठे थे, उन्हें एक आवाज ने चौंकाया –
“बाबा तुम आखिर आ ही गये” सामने बैठा एक भिखारी “बाबा तुम आखिर आ ही गये’ सा व्यक्ति उन्हें पास बुला रहा था, बाबा को सूखी रोटी खाने को दी और कहा, “उत्तर की ओर चले जाओ उत्तर की ओर चले जाओ वहीं सही दिशा है।” बाबासाहेब सीधे हरिद्वार पहुँचे। दा वहीं सही दिशा है।” े महीने परेशानी में गुजरने के बाद बाद जीवन गंगा को समर्पित करना चाहा पर पीठ पर हाथ का स्पर्श हुआ सामने वही सिद्ध साधु पुरुष। उनके समझाने के बाद बाबासाहेब परिवार में लौट लाये। बुखार की पुनरावृत्ति व अन्य घटनाएँ यथावत चालू थी। सन्‌‍ 1942 से 1949 तक माँ बम्लेश्वरी डोगरगड़ के सान्निध्य में एवं खैरागड में बाबासाहेब का जीवन कठोर आध्यात्मिक साधना में बीता।

Later Life

31 दिसंबर 1949 बाबासाहेब अवस्था में बुखार में पड़े थे। मुख से उद्बोधन शुरु हुआ, “अब भविष्य में मुझे इस शरीर में प्रगट होने की आवश्यकता नहीं है। इस शरीर के व्यक्ति को पूर्णतः आध्यात्मिक समर्थ एवं सायूज्य कर दिया गया है। अब उन्हें स्वामी विकासानंद के नाम से जाना जाएगा व ये समाज के उत्थान का निर्देशित कार्य करेंगे।”

अपनी आध्यात्मिक साधना के साथ स्वामी विकासानंदजी ने भजन को लोकसंग्रह व जनजागरण का माध्यम बनाया। लोकसंग्रह बढ़ते गया। संशयित भविष्य के डर से काँपते कदमों से कामना पूर्ति के लिये भक्त उनके पास आते। परंतु स्वामीजी ने कामना पूर्ति का वरदान नहीं दिया। उन्होंने जगाया उनका आत्मविश्वास, काँपते कदमों को दृढ़ता दी, कर्तव्य-पथ पर आगे बढ़ने को प्रेरित किया, अपने आशीर्वाद की बैसाखियाँ नहीं दी।

जनवरी 1958 प.पू.स्वामी विकसानंदजी ने अपने आवतरण के मिशन Living Livelihood को एक बोधचिन्ह एवं संदेश के साथ अपने अनुयायियों के समक्ष रखा। स्वामीजी द्वारा स्थापित हर आश्रम में यह बोध चिन्ह (Logo) विकासानंद मिशन के उद्देश्यों का प्रतीक है।

ऐसा क्या है इस व्यक्तित्व और विचारप्रवाह में कि व्यक्तियों का एक बड़ा समूह अभिमंत्रित हो जाए। हाँ निश्चित ही यह एक दीवानापन है। भव्यता के दर्शन से झुकना यह प्राणिमात्र का स्थायी भाव है परंतु यहाँ तो भव्यता में समर्पण की अभिलाषा दिखती है, जीवन मूल्यों में श्रद्धा, पुरुषार्थ पर विश्वास व व्यवहार में अनुनय दिखता है। यह दीवानापन, बेहोशी, अनुशासन बद्ध है। मनुष्यत्व का धर्म, मुमुक्षत्व का कर्म एवं महापुरुषत्व का संश्रय, इस दुर्लभ त्रिपुटी को सुलभ बनाने में स्वामीजी द्वारा स्थापित उपरोक्त शक्ति केंद्र निरंतर कार्यरत है।

विकास की अस्मिता जैसे प्रगट हुई यह व्यक्तित्व एवं विचार सार्वभौमिक हो गया। मैं से हम में रूपांतरित हो गया व व्यक्ति का संस्थापन हो गया। प.पू.स्वामी विकासानंदजी स्वयं एक महान सिद्ध योगी होते हुये भी एक भक्त के रूप में ही अपने शिष्य वर्ग में विचरण करते थे। ऐसे परम चैतन्य के व्यक्ति दर्शन का
लाभ हमें प्राप्त हुआ यह हमारा सौभाग्य है। 17 मार्च 1989 को प.पू.स्वामी विकासानंदजी का इस धरती पर अवतार कार्य पूर्ण हुआ। 1990 में प.पू.सद्गुरु के भक्तों ने श्रीपाद आश्रम, जबलपुर में स्मृति मंदिर बनाकर अपनी श्रद्धा को स्थापित किया।

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