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Teen Shire

तीन शिरे

तीन शिरे सहा हात । तया माझे दंडवत ॥
काखे झोळी पुढें श्वान । नित्य जान्हवीचे स्नान ॥
माथा शोभा जटाभार । अंगी विभूती सुंदर ॥
शंख चक्र गदा हातीं । पायीं खडावा गर्जती ॥
तुका म्हणे दिगंबर । तया माझा नमस्कार ॥
जे जे करशीत ते ते भरशील
ह्या वचनाला विसरू नको
अबला दुःखी करू नको ॥
अन्न फुकाचे मिळे म्हणोनी, पोट फुगवरी जेवू नको ।
अभिमानाच्या भरी पडोनी, पोट उपाशी राहु नको ॥
श्रीमंताचा बाळ म्हणोनी, अष्टप्रहरवरी झोपू नको ।
दैवाने पैसा दिधला म्हणुनी, व्यभीचाराने पेटु नको ॥
ज्या संगाने दुर्गुण वाढे, संग अशाचा धरू नको ॥
जे जे करशील ते ते भरशील
ह्या वचनाला विसरू नको
अबला दुःखी करू नको ॥
हेंचि दान देगा देवा । तुझा विसर न व्हावा ॥
गुण गाईन आवडी । हेची माझी सर्व जोडी ॥
नलगे मुक्ति धनसंपदा । संत संग देई सदा ॥
तुका म्हणे गर्भवासी । सुखे घालावे आम्हासी ॥
शान्ताकारं, भुजगशयनं, पद्मनाभं, सुरेशं, विश्वाधारं,
गगनसदृशं, मेघवर्णं शुभांगम्‌‍ । लक्ष्मीकांतं, कमलनयनं,
योगि भिर्ध्यानगम्यम्‌‍, वंदे विष्णू, भवभयहरं,
सर्वलोकैकनाथम्‌‍ ॥
पुंडलिक वरदा हरि विठ्ठल ॥

॥ श्री सच्चिदानंद सद्गुरूनाथ महाराज की जय ॥
॥ श्री गुरुदेवदत्त गुरुदेवदत्त गुरुदेवदत्त ॥
त्रिशुलमय वज्रं च तथा परशुसायकौ ।
खड्ग पाशांकुशाश्चैव पिनाकश्चायुधोत्तमा ॥
दिव्यायुधानि देवस्य दैव्याश्चैतानि नित्यशः ।
सत्कृत्य शिवयोराज्ञाम्‌‍ रक्षां कुर्वेन्तु मे सदा ॥
सर्वे भवन्तु सुखीनः, सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पशन्तु, मा कश्चिद्दुःखमाप्नुयात्‌‍ ॥
काले वर्षतु पर्जन्यः पृथिवी सश्यशालिनी ।
देशोयं क्षोभरहितो ब्राह्मणाः सन्तु निर्भयाः ॥
॥ हरि ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
रामकृष्ण हरी जय जय रामकृष्ण हरी
रामकृष्ण नाम सर्व दोष हरण
जड जीवा तारण रामकृष्ण नाम

जिनके तीन सिर हैं, छः हाथ हैं उन्हें (भगवान दत्तात्रेय) मेरा साष्टांग प्रणाम है । काँख में झोली, सम्मुख श्वान, नित्य गंगा-स्नान, जटाभार से सुशोभित माथा, भस्मांकित सुंदर अंग, हाथों में शंख, चक्र, गदा धारण करने वाले दत्तगुरु; जिनके खड़ाऊँ की ध्वनि गूँज रही है, उनके लिए तुका (संत कवि तुकाराम) कहते हैं ऐसे दिगंबर रूप को मेरा नमस्कार।

‘जैसा करोगे, वैसा भरोगे’ इन वचनों को कभी मत भूलो।

निर्बल को दुःख मत दो । फोकट में अन्न मिल रहा है तो इतना भी मत खाओ कि खाते-खाते पेट फूल जाए। इसी तरह दर्प में चूर हो भूखे पेट भी मत रहो। धनी परिवार के बालक को इस मस्ती में आठों पहर सोते मत रहो। भाग्य से प्रचुर संपत्ति मिली है तो दुराचार से उन्मत्त मत हो । जिस संग से दुर्गुण बढ़े ऐसा संग वर्जित करो ।

कभी मत भूलो कि तुम जो करोगे उसका (अच्छा-बुरा) हिसाब चुकाना पडेगा।

भक्त की भगवान से प्रार्थना है, ‘हे ईश्वर, मुझे यह दान दो कि मुझे तुम्हारा विस्मरण कभी न हो, प्रेम और आनंद से तुम्हारा गुणगान करना ही मेरा अर्जित धन हो। मुझे मुक्ति, धन-दौलत नहीं; संत-सहवास दो। संत कवि तुकाराम जी कहते हैं हम गर्भवासी हैं अर्थात्‌‍ जन्म लेते हैं इसीलिए हम जैसे सामान्य जीवों को भक्ति का आनंद मिलता है। हे प्रभु, हमें सार्थक जीवन प्रदान करो।’